Poem – अगर पेड़ भी चलते होते ….

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अगर पेड़ भी चलते होते
कितने मज़े हमारे होते ,

बांध तने में उसके रस्सी
चाहे जहा कहीं ले जाते |

जहाँ कहीं भी धूप सताती
उसके नीचे झट सुस्ताते |

जहां कहीं भी बर्षा हो जाती
उसके नीचे हम छिप जाते |

लगती जब भी भूख अचानक
तोड़ मधुर फल उसके खाते |

आती कीचड़ बाढ़ कही तो
झट उसके ऊपर चढ़ जाते |

अगर पेड़ भी चलते होते
कितने मजे हमारे होते |