Akbar-Birbal Story | जोरू का भाई

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2003

एक बार बादशाह सलामत हरम में अपनी बेगम के साथ बैठे हुए प्यार-मुहब्बत की बातें कर रहे थे। इतने में एक कनीज ने आकर बादशाह ने आकर बादशाह को झुककर सलाम किया और निहायत अदब के साथ फरमाया – ‘अलीजहाँ! टापके साले साहब तशरीफ लाए हुए हैं।’

बादशाह ने कनीज से पूछा – ‘यहीं पर भेज दो।‘ फिर बेगम की तरफ मुखातिब होकर बोले – ‘बेगम! तुम ने सुना है, सारी खुदाई एक तरफ, जोरू का भाई एक तरफ।’

बेगम भला कब चुप रहने वाली थी, बोली – ‘जहांपनाह! आप भूल रहे हैं, आपने दूसरा फिकरा गलत इस्तेमाल किया है।’

बादशाह ने कहा- ‘अच्छा तो अब सही सुना दो।’

तब बेगम ने जवाब दिया – ‘सारी खुदाई एक तरफ और दूल्हे का भाई एक तरफ।’

बादशाह बेगम की बात सुनकर हंसे। इतने ही में उनका साला अन्दर आ गया और सलाम करके एक तरफ खड़ा हो गया, तब बादशाह ने कहा- ‘साले साहब! तशरीफ रखीए।’

साले साहब सामने की कोच पर बैठ गए। तब बादशाह ने पूछा – ‘कहिए कैसे तकलीफ की, क्या बेगम को लिवाने आए हैं?’

साले साहब ने जवाब दिया- ‘अलीजहाँ! मैं लिवाने नहीं आया, एक अर्ज करने आया हूँ।’

बादशाह ने कहा- ‘फरमाइए, तहेदिल से आपकी अर्ज पर गौर किया जाएगा।’

यह सुनकर साले साहब ने अन्दर ही अन्दर खुश होकर कहा – ‘एक मर्तबा हुजूर ने फरमाया था कि अगर बीरबल की काबलियत का कोई मुसलमान हो तो हम बीरबल की जगह उसे दे सकते हैं।’

बदशाह ने कहा – ‘बेशक।’

साले साहब ने जवाब दिया – ‘जहांपनाह! मेरी परीक्षा ले ली जाए और अगर मैं परीक्षा में ठीक साबित हो गया तो मेरा चुनाव उस जगह पर किया जाए।’

बादशाह अपने साले की बात सुनकर एक बार तो थोड़ा हंसे, फिर बेगम की तरफ देखते हुए बोले – ‘साले साहब! अगर आप परीक्षा में खरे उतरे तो यकीन मानिए हम आपको वजीर बना देंगे।’

उसी समय बादशाह ने अपनी कनीज को कोयले की डाली ले आने का हुक्म फरमाया।

वह कनीज कोयले की डली को एक निहायत ही खूबसूरत रकाबी में रखकर बादशाह के सामने हाजिर हो गई। तब बादशाह उस कोयले की डली को अपने साले साहब को देते हुए बोले – ‘साले साहब! अगर आप तीन दिन के अंदर-अंदर इस कोयले को दस हजार रूपये में बेच आओगे तो हम आपको बीरबल से होशियार समझेंगे, यही आपकी परीक्षा होगी।’

बादशाह की बात सुनकर साले साहब के पांवों से जमीन खिसकने लगी। वह बेहद अफसोस के मारे घर आ पड़े और म नही मन कहने लगे – ‘या अल्लाह! इस कोयले का तो कोई एक पैसा भी न देगा। भला, यह दस हतार रूपये में कैसे बिक सकता है? मैं इस परीक्षा को कैसे पूरा करूं? बादशाह ने बीरबल को अपने से जुदा न करने के लिए मुझ पर भारी जुल्म किया है। या खुदा! वजीरेआजम बन ही नहीं सकता। बीरबल भी तो इस कोयले के दस हजार रूपये नहीं ला सकता। क्यों न मैं बादशाह से इस बात को कहूं?’

इस प्रकार सोच-विचार करते हुए तीसरे दिन बादशाह के सामने रोनी-सी सूरत में बोले – ‘हुजूर! गुस्ताखी माफ! इस कोयले के दस हजार रूपये कोई नहीं दे सकता, यह तो एक पैसे का भी नहीं।’

तब बादशाह ने हंसते हुए कहा- ‘घबराने की कोई बात नहीं, आप दरबार में तशरीफ लाइए।’

अतः साले साहब दरबार में पहुंचे। तभी दरबारी उनको निहायत सुस्त देख उनकी सुस्ती का सबब पूछने लगे। साले साहब ने अपना सिर चकराने का बहाना किया।

इसी समय बादशाह दरबार में तशरीफ जाए।

दरबार के जरूरी मामलातों से खाली होकर बादशाह ने अपने साले साहब की तरफ देखा। तब इशारा समझकर साले साहब ने दरबार में एक विशेष दरबारी को वह कोयले की डाली को देकर बादशाह के सामने पेश करने को कहा । वह विशेष दरबारी उस कोयले की डाली को लेकर बादशाह के सामने ले गया और पेश कर दी।

बादशाह वह कोयले की डाली बीरबल को दिखाते हुए बोले- ‘बीरबल! तुम इस कोयले को कितने दाम में बेच सकते हो?’

बीरबल बोले – ‘जितने में आप कहें हुजूर, उतने ही में बेच दूं।’?

बीरबल ने उससे कहा – ‘मैं इसे दस हजार रूपये में बेचना चाहता हूं।’

बीरबल ने ‘जो हुक्म’ कहकर वह डाली ले ली।

तब बादशाह बोले – ‘बीरबल! आपको हमें यह सबूत देना होगा कि फनां जगह इसको बेचा है।’

बीरबल ने यह भी मंजूर किया और अपने स्थान पर बैठ गए।

दरबार से आकर बीरबल ने एक दर्जी को काली मखमल का ढीला कुर्ता पाजामा और टोपी सीने का आदेश दिया। फिर कोयले की डाली को काफी बारीक पिसवाया। जब पिसते-पिसते पह डाली सुर्मे जैसी हो गई तो उन्होंने उसे एक आलीशान जवाहरात की डिब्बी में रखा, फिर उस डिब्बी को लेकर एक सोने के डिब्बी के अन्दर रखा, इसके बाद उस डिब्बी को एक बड़ी चांदी के डिब्बी के अंदर रखा। इस प्रकार इस डिब्बी को उन्होंने सात धातुओं की डिब्बियों के अंदर रख लिया।

तब डिब्बे को भी एक चमड़े की पेटी में रख लिया। इसके बाद एक काली आबनूस की हीरे-पन्ने के नगों से जड़ी हुई छड़ी निकाली, जिसकी मूठ सोने की थी। इतने में ही दर्जी कपड़े ले आया।

उन कपड़ों में भी बीरबल ने जगह-जगह पर कीमती जवाहरात और नग जड़ लिए। गले में भी बेशकीमती नगों की मालाएं पहन लीं। तब कपड़े पहने, हाथ में वह छड़ी लिए बीरबल मुम्बई पहुंचे। जहां एक आलीशान सराय में जाकर आलीशान कमरे में जा ठहरे और शहर में मुनादी करा दी कि शहर बगदाद से एक सुर्मे वाला आया है जिसके पास ऐसा सुर्मा है, जिसे लगाने से उसके मरे हुए घरवाले दिखाई देने लगते हैं। उस आला दर्जे के सुर्मे की एक सलाई की कीमत दस हजार रूपये हैं।

यह मुनादी सुनकर शहर भर में तहलका मच गया। हर आदमी अपने मरे हुए को देखने का ख्वाहिशमन्द था, लेकिन सुर्मे की कीमत सुनकर सबकी अक्ल खराब थी। उड़ते-उड़ते यह खबर एक मारवाड़ी सेठ तक पहुंची। उस सेठ ने नौकर को सुर्मे वाले को लिवाने सराय में भेजा। नौकर ने सराय में पहुंचकर बीरबल को सेठजी की फरमाइश बताई। बीरबल खुश होते हुए उस सेठ के पास पहुंचे। रास्ते से ही एक भीड़ उनके साथ हो ली।

वहां पहुंचकर नौकर ने बीरबल से हवेली के अंदर चलने को कहा। बीरबल बाले- ‘हम किसी के घर नहीं जाते। अतः अपने सेठ को बाहर बुलाइए।’

नौकर ने सेठ से सारा हाल कह दिया। तब सेठजी अपने बाग में आ गए, वहीं एक कुर्सी पर बीरबल बैठ गए। लोगों की भारी भीड़ भी वहीं बैठ गई। तब बीरबल ने अपने चमड़े की पेटी खोली, फिर डिब्बी में से डिब्बी निकालने लगे। वहां पहुंचकर नौकर ने बीरबल से हवाली के अंदर चलने को कहा। बीरबल बोले- ‘हम किसी के घर नहीं जाते। अतः अपने सेठ को बाहर बुलाइए।‘ नौकर ने सेठ से सारा हाल कह दिया। तब सेठ जी अपने बाग में आ अए, वहीं एक कुर्सी पर बीरबल बैठ गए। लोगों की भारी भीड़ भी वहीं बैठ गई। तब बीरबल ने अपने चमड़े की पेटी खोली, फिर डिब्बी में से डिब्बी निकालने लगे। फिर वह सातवीं जवाहरात की डिब्बी निकाली।

सेठजी तथा सब लोग बीरबल के कीमती लिबास, मालाएं तथा नग देखकर प्रभावित हो गए थे। तब बीरबल ने सेठजी से कहा – ‘दस हजार रूपये लाइए और देखिए अपने मरे हुओं को।’

सेठजी ने दस हजार रूपये की मुहरें मंगवाकर बीरबल को दे दीं, जिन्हें बीरबल ने संभालकर रख लिया। फिर एक सीपी की बनी सलाई निकाली और सुर्मे से लपेटकर सेठ की आंखों के पास लाकर बोले- ‘सेठजी! इस सुर्मे की एक और तारीफ यह है कि इससे उसी आदमी को अपने बुजुर्ग दिखाई देते हैं जो अपने मां-बाप से पैदा हो, दोगले से नहीं।’

यह कहकर बीरबल ने सेठ की आंखों में सलाई लगा दी और बोले- ‘कहो सेठजी! आपको बुजुर्ग दिखाई दे रहे हैं या नहीं?’

सेठजी ने सोचा कि अगर नहीं कहता हूं तो इतनी बड़ी भीड़ और नौकर-चाकरों के सामने दोगला साबित होता हूं। त बवह बड़े संकोच के साथ बोले- ‘हां, मुझे सब दिखाई दे रहे हैं।’

तब बीरबल ने कहा – ‘अच्छा तो अपना पूरा पता लिखकर मुझे अपने हाथ की सनद दीजिए, जिसमें लिखा हो कि मैंने दस हजार रूपये देकर इस सुरमे को लगाया और मुझे अपने बुजुर्ग दिखाई देने लगे।’

सेठ ने मजबूरीवश सनद लिख दी। बीरबल लौटकर बादशाह के पास आए। बादशाह पहले तो उन्हें पहचान ही नहीं सके। फिर पहचानकर हंस पड़े। बीरबल ने बादशाह को शुरू से आखिर तक का वृतान्त सुनकर सनद दिखा दी, जिसे सुनकर व देखकर सारा खिलखिला उठा।

तब बादशाह ने अपने साले साहब से कहा – ‘कहिए साले साहब! बीरबल ने गैर मुमकिन को भी मुमकिन कर दिखाया है कि नहीं?’

 

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